तो आज में एक ऐसे भारतीय कविदन्ति (legend) की बात करने जा रहा हु जो एक सच्चे देश भक्त है।
बाबा हरभजन सिंह ,वे एक सिख परिवार में ३० अगस्त १९४६ को जन्मे। वे सरदाना नामक गांव में जन्मे और बड़े हुए। उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई पंजाब के पुट्ठी नमक गांव के Dav हाई-school से पूरी की। उसके बाद उन्होंने अमृतसर से भारतीय फ़ौज में भर्ती हो गए। उनके पहले रेजिमेंट का नाम सिख रेजिमेंट था।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी बढ़ोतरी कर ली थी। लगभग एक साल बाद उन्हें १८ सिख रेजिमेंट में चुना गया। वह भी उन्होंने अपना सम्पूर्ण काम किया।
फिर ३-४ साल बाद उन्हें २१ सिख रेजिमेंट में भेज दिया गया। वहा उनकी ड्यूटी सिक्किम के नाथुला पहाड़ पर तय हुई। यह एक ऐसी हिंदुस्तानी सरहद थी जो भारत और चीन के बीच स्थित है। इंडो-चाइना बॉर्डर के नाम से भी इसे जाना जाता। इस पहाड़ की उचाई १४,ooo फट तक है। क्या आप सोच सकते है की कैसी ज़िन्दगी होती होगी इन फौजियों की ?
इस बीच उन्हें सामान पहुंचाने का काम सौपा गया। हरभजन सिंह जी अपने सैनिको के लिए सामान पहुंचने निकले। उस दौरान अनहोनी घटी और वे उस खाई में गिर गए। उनके रेजिमेंट को उनके बारे में न पता चलने पर उनको भगोड़ा घोषित कर दिया गया। उसके ठीक एक साल बाद उन्होंने अपने मित्र को सपने में आकर उनकी लाश की जगह बताई ,उसके अगले ही दिन सर्च टीम को उनकी लाश मिली।
कहा जाता है की वे अपनी मृत्यु के बाद भी नाथुला सरहद पर अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभाते रहे। जब भी उनकी सरहद पर कोई सैनिक पलक भी जपकता ,उसके अगले ही पल वह अपने गाल पर जोरों का चाटा महसूस करते जैसे उन्हें किसी आफसर ने चाटा मारा हो।
कई बार वे सैनिको के सपनो में आकर उन्हें दुश्मनो के पैतरे भी बताकर जाते। आज भी उनकी तनख्वा उनके घरवालों को पोहोच दी जाती है, आज भी जब वह कोई चिनेसे मिलिट्री कांफ्रेंस होता है तो उनके लिए भी एक कुर्सी छोड़ दी जाती है। हर साल ११ मई को मिलिट्री बेस से उनका सामान भी कपूरथला स्टेशन तक दो फौजियों के साथ ले जाई जाती है। उनके कपडे जो आज भी मिलिट्री बेस पर रखे हुए है वह खुद-बखुद साफ़ हो जाते है। उनको भारत सरकार ने परमवीर चक्र से सम्मानित कियागया है।
अब तो हमें यहाँ भी मन्ना पड़ेगा की --
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